Veterinary course: #04 मेटीरिया मेडिका एण्ड टोक्सिकोलॉजी (Materia medica and toxicolog)

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Veterinary Materia medica and toxicolog

veterinary Materia medica and toxicolog hindi

प्राथमिक पशु चिकित्सा के इस कोर्स में आपको मेडिसिन के संछिप्त नाम और मेडिसिन के बारे में जानना जरुरी है। क्योंकि इस कोर्स में हम आपको आगे विभिन्न-विभिन्न प्रकार के बीमारी का इलाज बताने वाले है जिसमे सभी तरह के मेडिसिन के संछिप्त नाम और उसके विवरण के बारे में पहले से आपको पता रहना बहुत जरुरी है।

मेटीरिया मेडिका एण्ड टोक्सिकोलॉजी (MATERIA MEDICA AND TOXICOLOG)

प्राथमिक पशु चिकित्सा में प्रयोग होने वाले कुछ शब्द तथा उनका विवरण-

01. प्रति जैविकी (Antibiotics)

इनकी उत्पत्ति जीवाणु अथवा फफूंद (Mould ) से होती है तथा यह जीवाणु नाशक अथवा जीवाणु रोधी होते हैं। इन्हें फोड़ा, जख्म, दस्त, सर्दी, खाँसी, न्यूमोनिया, ज्वर, मेस्टाइटिस, टोंसिलाइटिस, गलाघोंटू, ब्लैक क्वाटर, एन्थ्रैक्स, एफ एम डी रिन्डरपेस्ट आदि रोगों के लिए पशुओं को दिया जाता है। ये निम्न प्रकार की होती हैं –

अ- कम दायरे वाली (Narrow Spectrum)

  • पेनिसिलिन ग्रुप- (Against Gram Positive Bacteria) जैसे- प्रोनापेन, ओम्नासिलिन, टेरामाइसिन, सेक्लोपेन आदि ।
  • अधिक समय तक अर्थात् 3-4 दिनों तक प्रभावशाली पेनिसिलिन जैसे- प्रोकेन पेनिसिलिन – जी- ऑयली (पाम), पेनिडियोर, लोंगासिन आदि।
  • स्ट्रेप्टो पेनिसिलिन ग्रुप – ( Streptopenecillin) Against Gram Positive and Gram Negative Bacteria) जैसे- विस्ट्रीपेन, कम्बायोटिक, डाइकिस्टीसीन, आमनामाइसीन, बेटीपेन आदि ।

ब- अधिक दायरे वाली (Broad Spectrum) Aga Gram Positive and Gram Negative Bacteria)

  • एम्पीसिलीन, वासीपेन, कैम्पीसीलीन, स्काईसिलन- वेट, रोसीलीन आदि ।
  • जेन्टामाइसिन (Gentamycin ) – जेन्टावेट, जेन्टासीन, प्रीमीसीनवेट, जैन्टीम आदि ।
  • ऑक्सीटेट्रासाइक्लीन(Oxytetracycline ) – Terramycin, ऑक्सीस्टेक्लीन, टेलान-एल-ए, ऑक्सी वेट एल ए ऑक्सवेट आदि ।
  • टेट्रासाइक्लीन- एक्रेमाइसिन, स्टेक्लिन, स्टैकलीन वोलस, होस्टासाइक्लीन पाउडर आदि ।
  • डौक्सीसाइक्लीन (Doxycycline ) – बीडाक्स, लेन्टेक्लीन आदि ।
  • इरीथ्रोमाइसीन (Erythromycin ) – एथ्रोसीन, इ-माइसीन, एल्ट्रोसीन आदि ।
  • एमोक्सीलीन (Amoxycillin ) – सिनामौक्स, डेलामान आदि ।
  • एनरोफ्लोक्सिन- एनरोसिन ।
  • वेनेमाइसिन – केन्सिन ।
  • क्लोरोम फेनीकॉल (Chloramphenicol) – क्लोरोमाइसीन, फेनावेट, रेनफेनीकाल, बेटनीकाल आदि ।

02. पीड़ाहारी (Analgesics or Anodynes)

ऐसी औषधियाँ जिनके प्रयोग से स्नायु की उद्दीप्तता (Irritability) कम या समाप्त हो जाती है। जैसे- अमोनिया, कपूर, बेलाडोना, एकोनाइट आदि के लिनीमेंट, एस्पिरीन, एनालजीन, न्यूरोवियन, पैरासीटामोल, डिक्लोफेन, मैलोक्सीकैम, कीटोप्रोफेन, आइबूप्रोफेन, नमोस्लाइड आदि।

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03. पोषण सुधारक (Alteratives)

ऐसी औषधियाँ जिनके प्रयोग से तन्तुओं में ऐसे परिवर्तन होते हैं, जिनसे शरीर के अंगों के पोषण में सुधार होता है। इनका प्रयोग रूग्णावस्था या अधिक लता की स्थिति में किया जाता है। जैसे- आयोडीन, आर्सेनिक, सल्फर, फास्फोरस, कार्ड या शार्क लीवर ऑयल, वेलामाइल, लिवोजन, एन-लिव (इंजेक्शन), एसीटालार्सन, कैटासोल, कोबाफौस, टोनोफास्फेन आदि ।

04. निश्चेतक या संवेदनाहारी (Anaesthetics)

ऐसी औषधियाँ जिनके प्रयोग से पशु अचेतन अवस्था में आ जाता है। जैसे- क्लोरोफॉर्म, ईथर, नाइट्रस ऑक्साइड, नोवोकेन, सिक्विल, जाइलोकेन, थायोपैन्टोन सोडियम, जाइलेजिन, कैटामिन आदि ।

05. सल्फा ड्रग्स (Sulpha Drugs) ( सल्फोनामाइड्स )

यह दवाएं जीवाणुरोधी हैं। इन्हें प्रयोगशाला में संश्लेषण द्वारा बनाया जाता है। यह पैरा ऐमीनोबेन्जेन – सल्फोनामाइड नामक तत्व से बनाये जाते हैं, जिसे अलग-अलग प्रकार से संश्लेषित कर विभिन्न औषधियाँ बनायी जाती हैं। जैसे सल्मेट, वेक्ट्रीम, डायडीन, सल्फामेजाथीन, सल्फा बोलस, सेप्ट्रान, ट्रीनामाइड, आदि गोली ।

06. ऐनालेप्टिक्स (Analeptic)

ऐसी औषधियाँ जिनके प्रयोग से हृदय तथा फेंफड़ों को बल एवम् उत्तेजना प्राप्त होती है। जैसे डिजिटेलिन, निकेथामाइड, लेप्टाजोल आदि । –

07. कृमिहर (Anthelmentic)

ऐसी औषधियाँ जिनके प्रयोग से अन्तः परजीवी या तो मर जाते हैं। या जीवित अवस्था में ही शरीर से बाहर आ जाते हैं। जैसे- कॉपर सल्फेट, हैक्जाक्लोरोईथेन, कार्बन टेट्राक्लोराइड, पिपराजीन, मीबैन्डाजोल, एलबैन्डाजोल, रिफॉक्सीनाइड, फैनबैन्डाजोल, ऑक्सीक्लोजेनाइड, ऑल आउट बोलस आदि ।

08. जीवाणुरोधी (Antiseptic)

ऐसी औषधियाँ जिनके प्रयोग से जीवाणु की वृद्धि रूकती है तथा वातावरण, यन्त्र एवम् उपकरण शुद्ध किये जाते हैं। यह जीवाणुओं को नष्ट नहीं करती है। जैसे एक्रीफ्लेविन, पोटेशियम पर मेग्नेट, मरक्यूरोकोम, सेवलॉन आदि ।

09. सूजन या शोधहारी (Anti-Inflammatory)

ऐसी औषधियाँ जिनके प्रयोग से सूजन या शोध कम हो जाता है जैसे- फिलाइन ब्यूटाजोन, प्रैडनिसालोन, डेक्सामिथाजोन, बेटामिथाजोन, एन्थीसान, फेनार्गन, वेटालॉग, डकाड्रान, फेनाविल, फुराडेक्स, कुराल, काडिस्टीन, ट्राइएमसीनोलॉन आदि ।

10. ज्वरहारी (Antipyetics)

ऐसी औषधियाँ जिनके प्रयोग से ज्वर कम या नष्ट हो जाता है। जैसे- क्वीनीन, सोडासैलीसिलास, एस्प्रीन, पैरासीटामोल, निमोस्लाइड आदि ।

11. उद्दीपनहारी (Antipuritics) –

ऐसी औषधियाँ जिनके प्रयोग से उद्दीपन (Irritation) कम हो जाता है जैसे- गार्डीनल, कोकेन, कार्बोलिक एसिड, सिक्विल, मेक्सेरोना, एस्काजीन, लाजेक्टिल आदि ।

12. विषध्न (Anti-dotes )

ऐसी औषधियाँ जिनके प्रयोग से शरीर में उपस्थित या प्रविष्ट विषों को – निष्क्रिय कर दिया जाता है जैसे- अम्ल विष को क्षारीय औषधियों तथा क्षार विष को अम्लीय औषधियों से निष्क्रिय किया जाता है।

13. कफरोधी (Anti-expectorants)

ऐसी औषधियाँ जो फुफ्फुस नाल तथा उपनालों से स्त्रावों को कम करके खाँसी से रक्षा करती हैं जैसे- बेलाडोना, अफीम आदि से बनी औषधियाँ, वेनाड्रिल, ग्लाइकोडीन, फेन्सीडिल, कैटकफ, कैफलॉन, कोरैक्स, कोफैक्स आदि ।

14. एन्टीजाइमोटिक्स (Anti-zymotics)

ऐसी औषधियाँ जिनके प्रयोग से उदर तथा अन्तड़ियों में अनावश्यक फरमेन्टेशन से गैस के बनने में अवरोध उत्पन्न होता है। इनका प्रयोग अफारा, उदरशूल आदि में किया जाता है जैसे- तारपीन के तेल, फार्मेलीन, एनोरेक्सान, नोवल्जीन इंजेक्शन, वेलामाइन इंजेक्शन, ब्लोटोसील, टिम्पेक्स, टिम्पोल चूर्ण, रूमेंटान गोली, पूर्ति बोलस

15. तिक्त पदार्थ (Bitters)

ऐसी औषधियाँ जो रासायनिक रचना तथा कडुई होती हैं और उदर तथा आँतों के सैक्रीसन ( उदासज नक्स वोमिका आदि । एक दूसरे से भिन्न होती हैं। में वृद्धि करती हैं जैसे- चिरायता,

16. कषाय (Astringents)

ऐसी औषधियाँ प्रयोग से म्यूकस मेम्ब्रेन, रक्त वाहनियों तथा ऊतकों में संकुचन पैदा होता है तथा सेक्री‍ बन्द हो जाते हैं। आँतों में प्रयोग होने वाली औषधियों को इन्टेस्टाइनल एस्ट्रीनजेन्टस (Intestinal Astringents) कहते है। जैसे- कत्था, बेलाडोना, चौक बेलगिरि, क्लोरोडीन, नैबलॉन पाउडर, डायरॉक पाउडर आदि ।

17. वायुहारी (Carminatives)

ऐसी औषधियाँ जिनके प्रयोग से उदर तथा आँतों की अनावश्यक वायु बाहर निकल जाती है जैसे- एल्कोहल, सौंफ, हींग, काला नमक, जीरा, अदरक, मेथी, तारपीन

18. दाहक (Caustics)

ऐसी औषधियाँ जिनके प्रयोग से ऊतक नष्ट हो जाते हैं जैसे- सिल्वर नाइट्रेट, कॉपर सल्फेट, मरक्यूरिक क्लोराइड आदि ।

19. जीवाणुनाशी या रोगाणुनाशी (Disinfectants)

ऐसी औषधियाँ जिनके प्रयोग से जीवाणु तथा विषाणु नष्ट हो जाते हैं। जैसे- फिनोल, क्लोरीन लाइजोल आदि ।।

20. शोष (Desicants) –

ऐसी औषधियाँ जिनके प्रयोग से घाव तथा छाजन शीघ्रता से नष्ट हो जाते हैं। जैसे- बोरिक एसिड, जिंक ऑक्साइड आदि ।

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21. अपमार्जक (Detergent )

ऐसी औषधियाँ या पदार्थ जिनके प्रयोग से यन्त्र एवम् उपकरण साफ हो जाते हैं तथा उनकी चिकनाहट समाप्त हो जाती है। जैसे साबुन का पानी, सोडियम तथा पोटेशियम हाइड्राक्साइड तथा कार्बोनेट्स आदि ।

22. गन्धहारक (Deodorants)

ऐसे पदार्थ जो अरूचिकर गन्ध को ढ़क देते हैं जैसे- चारकोल, ब्लीचिंग पाउडर, सरसों का तेल, पोटेशियम परमेग्नेट आदि ।

23. मूत्रल (Diuretics)

ऐसी औषधियाँ जिनके प्रयोग से मूत्र का बनना तथा निकलना बढ़ जाता है। जैसे- कैलोमल, पोटेशियम नाइट्रेट, मेगसल्फ, स्टेनिल पाउडर, एल्कासोल द्रव, जाइलोरिक टेबलेट, साइट्रोलिक्विड (द्रव) सिस्टोन पाउडर या गोली, लैसिक्स, रैडिमा आदि SE

24. बमनकारी (Emetics)

ऐसी औषधियाँ जिनके सेवन से बमन हो जाता है। जैसे- सरसों, कॉपर – सल्फेट, जिंक सल्फेट तथा नमक आदि ।

25. दुग्ध प्रस्रावी (Galactogogues )

ऐसी औषधियाँ या पदार्थ जिनके प्रयोग से दुग्ध उत्पादन में वृद्धि होती है जैसे- थाइरोक्सीन, मिनरल पाउडर, फर्टीमिक्स पाउडर, एनमिन फोर्ट पाउडर, लेप्टाडेन गोली, लेक्टोन चूर्ण, दुग्ध दान गोली आदि । CiRCAL

26. रक्तरोधक (Haemostatic)

ऐसी औषधियाँ या पदार्थ जिनके प्रयोग से रक्त का बहना रुक जाता है जैसे- फिटकरी, टिंचर बेंजोइन, टिंचर फेरीपरक्लोर, बर्फ, कडिस्पार, इन्जे० क्रोम, सिग्मा क्रोम, रेवीसी, स्टैप्टोक्रोम आदि ।

27. निद्राकरी (Hypnotics)

ऐसी औषधियाँ जिनके खाने से निंद्रा आ जाती है जैसे- ब्रोमाइड्स, क्लोरलहाइड्रेट्स त क्लोरलहाइड्रेट्स तथा सीक्वल आदि।

28. उत्तेजक (Irritants )

ऐसी औषधियाँ जिनके प्रयोग से शरीर का भाग उद्दीप्त (Stimulates ) तथा अभिज्वलित (Inflame ) हो जाता है जैसे- कन्थराइडिन तथा रेड आयोडाइड ऑफ मरकरी मलहम आदि ।

29. सम्वेदन मन्दक (Narcotics)

ऐसी औषधियाँ जिनके खिलाने से गहरी नींद आ जाती है तथा रक्त संवहन एवम् श्वॉस क्रिया मन्द हो जाती है। जैसे- क्लोरोफॉर्म, ईथर, भंग तथा क्लोरलहाइड्रेटस, मेन्डेक्स, एलप्रैक्स आदि ।

30. परजीवीनाशक (Paraciticides )

ऐसी औषधियाँ जिनके प्रयोग से शरीर के वाह्य भागों में परजीवी नष्ट हो जाते हैं जैसे- गेमेक्सीन, डी०डी०टी०, बेंजाइल बेंजोएट, पेस्टोबेन द्रव, टेटमासोल साबुन व्यूटाक्स लोशन, मेडिकर घोल, टिककिल, मेलाथियान स्प्रे, साइपर मैथ्रीन, डेल्टा मैथ्रीन, मोनोसल्फीराम, आइवरमैक्टिन आदि ।

31. रेचक (Purgative)

ऐसी औषधियाँ जिन्हें खिलाने से दस्त आने लगते हैं जैसे- लिक्युड पैराफीन, शीरा, अलसी का तेल, मेग्नीशियम सल्फेट, सोडियम क्लोराइड, कैस्टर ऑयल आदि ।

32. पोषक (Nutrients)

ऐसी औषधियाँ तथा पदार्थ जिनके प्रयोग से ऊतकों तथा अंगों को पोषण – प्राप्त होता है जैसे- मिनरल पाउडर, बिटामिन बी-कॉम्पलैक्स, शार्क लीवर ऑयल एनमिन फोर्ट चूर्ण, फर्टीमिक्स चूर्ण, गैलाग चूर्ण, आदि ।

33. परिरक्षक (Preservatives)

ऐसी औषधियाँ जिनको मिला देने से दूसरी औषधियाँ, घोल तथा पदार्थ पर्याप्त समय तक संरक्षित रखे जा सकते है। जैसे- कार्बोलिक एसिड, एल्कोहल, फॉर्मलीन, सोडियम बेन्जोएट आदि । MER

34. प्रशीतक (Refrigerant)

जिनके प्रयोग से शरीर के भाग को ठंडक अथवा आराम का अनुभव होता है जैसे- पिपरमिंट व्हाइट लोशन, बर्फ आदि ।

35. वल्स (Tonics)

ऐसी औषधियाँ जिनसे शरीर को धीरे-धीरे शक्ति प्राप्त होती है तथा दुर्बलता मिटा देती है जैसे- टोनोफॉस्फेन, कोबाफॉस, यूरिमिन, एसिटालॉर्सन, कैटासॉल, विटामिन्स (विशेषकर विटामिन बी काम्पलैक्स) मिनरल्स आदि ।

36. उद्दीपक (Stimulants)

ऐसी औषधियाँ जो शरीर के अंगों को शीघ्रता से शक्ति प्रदान करते हैं तथा इनका प्रभाव भी शीघ्रता से समाप्त हो जाता है। जैसे- कोरामीन, डिजिटेलीन, एमफेटामाइन एवं कार्टीजोन्स (डेक्सोना, वेटलॉग), ऐड्रेनलीन आदि ।

37. जीवाणुरोधी मलहम (Antiseptic Ointments)

ऐसी औषधियाँ जो फोड़ा फुंसी, घाव, जख्म आदि त्वचा रोगों में गुणकारी है जैसे- टैरामाइसीन, सोफामाइसीन, फुरासीन, हिमेक्स, लौरेक्सान, बेटाडीन, 5% नियोस्प्रीन आदि ।

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